06/10/2022
देश राजनीति

ममता, द्रौपदी मुर्मू की वकालत क्यों कर रही हैं? बंगाल CM का कहना है राष्ट्रपति चुनाव में उनकी ‘संभावना अधिक’

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के यह कहना कि अगर विपक्षी दलों के साथ नाम पर पहले चर्चा की जाती तो वह भाजपा-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के समर्थन पर विचार कर सकता था, के एक दिन बाद रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि मुर्मू की उम्मीदवारी सभी दलों को एक साथ ला सकती है.

बैठक में मौजूद सूत्रों के मुताबिक, हैदराबाद में रविवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को संबोधित करते हुए मोदी ने ममता का नाम लिए बगैर कहा कि एनडीए की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार सभी दलों के लिए ‘एकजुटता का माध्यम’ बन सकती हैं. प्रधानमंत्री ने कुछ विपक्षी दलों की तरफ से मुर्मू की उम्मीदवारी का समर्थन किए जाने के संदर्भ में यह बात कही.

प्रधानमंत्री ने मुर्मू की विनम्रता और समाज के उत्थान के लिए उनके कार्यों के बारे में बताया. निर्वाचित होने पर वह राष्ट्रपति बनने वाली पहली आदिवासी महिला होंगी.

आदिवासी समुदाय के एक सदस्य को अपना उम्मीदवार चुनने के एनडीए के फैसले को मोदी सरकार का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है. मुर्मू की उम्मीदवारी को बीजेपी के सहयोगी दलों के अलावा बीजू जनता दल, शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने खुले तौर पर समर्थन दिया है.

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ने शुक्रवार को संवाददाताओं से कहा कि अगर एनडीए ने बतौर दावेदार मुर्मू का नाम विपक्षी दलों के साथ पहले साझा किया होता, वह भी उस पर ‘चर्चा’ करता.

उन्होंने आगे कहा, ‘उन्होंने हमारे साथ चर्चा नहीं की, उन्होंने हमसे हमारा सुझाव मांगा था. अगर उन्होंने हमें नाम बताया होता तो हम विपक्ष की बैठक में इस पर चर्चा करते. हम जानते हैं कि महाराष्ट्र के घटनाक्रम के बाद द्रौपदी मुर्मू की संभावना अधिक है लेकिन मैं एकजुट विपक्ष के फैसले के साथ खड़ी हूं.’

यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब ममता बंगाल में बीजेपी के आदिवासी जनाधार में सेंध लगाने की कोशिश में जुटी हैं, जिसने 2019 के आम चुनावों के दौरान राज्य में पार्टी की सफलता में अहम भूमिका निभाई थी. उस समय पार्टी ने 18 सीटो के साथ  यहां सबसे ज्यादा सीटें हासिल की थीं.

वह ममता ही थीं जिन्होंने इस महीने के शुरू में देशभर के कई विपक्षी दलों को पत्र लिखकर नई दिल्ली में 15 जून की बैठक में भाग लेने को कहा था ताकि आगामी राष्ट्रपति चुनावों के लिए एक साझे उम्मीदवार का नाम तय किया जा सके. पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा कांग्रेस समेत 13 विपक्षी दलों के सर्वसम्मति से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में उभरे. उनकी उम्मीदवारी की घोषणा करने के लिए विपक्षी दलों की बैठक से कुछ ही समय पहले उन्होंने टीएमसी से इस्तीफा दे दिया.

दार्जिलिंग से भाजपा सांसद राजू बिस्ता ने दावा किया कि ममता का ‘आदिवासी विरोधी रुख अब उजागर हो गया है.’

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, ‘द्रौपदी मुर्मू हमारे देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति होंगी लेकिन उन्होंने (ममता) विपक्ष के साथ मिलकर इसके खिलाफ जाने का फैसला किया. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि नाम की घोषणा कब की गई. दलित हों, आदिवासी हों या गोरखा, ममता बनर्जी ने हमेशा उनकी उपेक्षा की है और उनके विकास के लिए कुछ खास नहीं किया है. मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा कि क्या विपक्ष को अपना उम्मीदवार हटा लेना चाहिए था. विरोध करना उनका धर्म है और वे यही करते रहे हैं.’

 

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