24/09/2022
खेल देश

MP की रणजी ट्रॉफी में जीत बताती है कि खेल आपको सब कुछ देता है, लेकिन अपने नियत समय पर

यह साल 1999 की गर्मियों की बात है जब बेंगलुरु के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम ने रणजी ट्रॉफी के फाइनल की मेजबानी की थी. मध्य प्रदेश सभी उम्मीदों को पार करते हुए भारत के इस सबसे बड़े घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट के फाइनल में पहुंच गया था. वहां उसकी भिड़ंत कर्नाटक की टीम से हुई, जो अपने घरेलू मैदान पर खेल रही थी. मध्य प्रदेश का नेतृत्व चंद्रकांत पंडित ने किया, जिन्होंने कर्नाटक की पारी को 304 के स्कोर तक सीमित रखने के लिए अपनी टीम का बखूबी नेतृत्व किया.

महान क्रिकेटर सैयद मुश्ताक अली के पोते और चंद्रप्रकाश साहू एवम् देवेंद्र बुंदेला के द्वारा बनाए गये बड़े स्कोर वाले योगदान की बदौलत मध्य प्रदेश ने पहली पारी में 70 के आसपास रनों की महत्वपूर्ण बढ़त हासिल की.

कर्नाटक ने चौथे दिन के विकेट पर अच्छी बल्लेबाजी करते हुए 300 से अधिक का स्कोर बनाया और मध्य प्रदेश को जीतने के लिए 247 रनों की चुनौती दी. दूसरी पारी में एस अब्बास अली ने फिर से 47 रन बनाए, लेकिन मध्य प्रदेश का निचला-मध्य क्रम ध्वस्त हो गया और चंद्रकांत पंडित के दल को दूसरे सर्वश्रेष्ठ पायदान से समझौता करना पड़ा. यह उनके लिए एक भीषण झटके जैसा था. यह उनके साहस की हार थी.

आख़िर बार होलकर्स के रूप में मिली थी सफलता

हमारे क्षेत्र के क्रिकेट की खातिर जीत की जरूरत कर्नाटक से अधिक मध्य प्रदेश को थी. कर्नाटक ने पहले ही भारतीय क्रिकेट की इस प्रमुख घरेलू प्रतियोगिता में कई बार सफलता का स्वाद चख लिया था, लेकिन मध्य प्रदेश के पास तब तक ऐसा कोई सम्मान नहीं था. मध्य प्रदेश की आखिरी सफलता को ढूंढने के लिए हमें साल 1952/53 सीज़न में वापस जाना पड़ेगा, और वह जीत भी होलकर्स के रूप में आई थी.

आज जो मध्य प्रदेश है उसे पुराने जमाने में सेंट्रल ज़ोन (मध्य क्षेत्र) और होलकर भी कहा जाता था.

यह महान क्रिकेटर एस मुश्ताक अली की प्रतिभा और भाऊसाहेब बाबासाहेब निंबालकर का धैर्य था जिन्होंने फाइनल में दोहरा शतक जड़कर होल्कर को बंगाल के खिलाफ पहली पारी में बढ़त दिलाने में मदद की थी. दूसरी पारी में बंगाल ने 48 ओवर में 320 रन बनाकर अपनी पारी घोषित कर दी.

वर्तमान पीढ़ी के उन लोगों के लिए जो पिछले जमाने के क्रिकेट को धीमी गति का मानते हैं, यह ध्यान देने योग्य बात है कि 1953 में बंगाल ने चौथी पारी में होल्कर के सामने एक कड़ा लक्ष्य पेश करने के लिए तीसरी पारी में प्रति ओवर छह रन से अधिक की दर से रन बनाए थे. यह मैच एक कांटे का मुकाबला बन गया था और होल्कर ने नौ विकेट खो दिए, लेकिन वे किसी तरह से मैच को ड्रॉ करने और पहली पारी की बढ़त के आधार पर खिताब जीतने में सफल रहे.

हालांकि, यह जीत मध्य प्रदेश को नहीं बल्कि होल्कर की छत्रछाया वाली टीम की थी. होलकर्स की सफलता केवल स्थानीय प्रतिभाओं की वजह से ही नहीं, बल्कि उन महान क्रिकेटरों की वजह से भी थी जो वर्तमान मध्य प्रदेश के अलावा अन्य क्षेत्रों से आते थे. मध्य प्रदेश की अपनी एक समृद्ध क्रिकेट विरासत है और इंदौर एक ऐसा शहर है जहां हमेशा से क्रिकेट के खेल को बहुत अधिक पसंद किया जाता रहा है. महान एस मुश्ताक अली, सीके नायडू, एमएम जगदाले और बीबी निंबालकर जैसे क्रिकेट के वे दिग्गज हैं जिन्होंने इस मध्य भारतीय राज्य का प्रतिनिधित्व किया है.

मध्य प्रदेश एक अत्यंत समृद्ध बाहरी प्रभाव का भी दावा कर सकता है, क्योंकि एमएम जगदाले और बीबी निंबालकर जैसे शानदार क्रिकेटर इसके क्रिकेट को संस्कृति को समृद्ध करने के लिए बड़ौदा और महाराष्ट्र जैसे स्थानों से यहां आए थे. बीबी निंबालकर ने तो एक बार प्रथम श्रेणी क्रिकेट की एक पारी में 443 रन बनाए थे – जो आधुनिक क्रिकेट में अनसुनी सी बात है. पिता और पुत्र की जोड़ी के रूप में एमएम और संजय जगदाले को भारत के लिए राष्ट्रीय चयनकर्ता के रूप में सेवा करने का दुर्लभ गौरव प्राप्त है. संजय ने वर्षों से मध्य प्रदेश क्रिकेट के लिए महती सेवा की है. बाद के वर्षों में, मध्य प्रदेश की टीम संदीप पाटिल जैसे खिलाड़ियों के साथ समृद्ध हुई, जिन्होंने 1988 से 1993 तक इसकी कप्तानी की और एक विडंबना यह भी है कि उन्होंने अपने मूल राज्य बॉम्बे के खिलाफ एक पारी में 185 रन बनाए थे.

फिर भी रणजी ट्रॉफ़ी में जीत रही पहुंच से दूर

फिर भी, मध्य प्रदेश के लिए रणजी ट्रॉफी मे जीत पहुंच से बाहर ही बनी रही. हाल के इतिहास में, मध्य प्रदेश की सबसे बेहतरीन बल्लेबाजी प्रतिभा 1990 के दशक में खब्बू (बाएं हाथ के) बल्लेबाज अमय खुरसिया के रूप में सामने आई. मेरे जैसे क्रिकेट प्रेमियों ने उनमें एक विश्व स्तरीय खिलाड़ी का अपना स्थानीय संस्करण देखा. आखिर वह उसी टीम की तरफ से खेल रहे थे जिसमें सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ भी थे. बल्लेबाजी क्षमता के मामले में अमय किसी से पीछे नहीं थे और महान एस मुश्ताक अली की तरह उनकी ताकत उनकी तेजतर्रार बल्लेबाजी थी.

उन्होंने मध्य प्रदेश के लिए तीन बार रणजी ट्रॉफी के एक सत्र में 500 से अधिक रन बनाए और भारतीय टीम में भी प्रवेश पा लिया. 1999 के विश्व कप के दौरान, भारत यूनाइटेड किंगडम के मैनचेस्टर स्थित ओल्ड ट्रैफर्ड स्टेडियम में पाकिस्तान से खेल रहा था. एक खेल प्रेमी के रूप मैं अपने गृह राज्य के लड़के को अपने सबसे खास गेंदबाजी नायक वसीम अकरम के ऊपर हावी होते देखने की उम्मीद के साथ स्टेडियम में पहुंचा था. हालांकि, अमय इंग्लैंड में हुए उस विश्व कप के लिए भारतीय दल में थे, लेकिन उन्हें एक भी मैच खेलने को नहीं मिला. जैसे ही अमय के खेलने के दिन समाप्त हुए, मैं निराशा में घिर गया, मुझे इस बात की चिंता थी कि मध्य प्रदेश में अगली विश्व स्तरीय क्रिकेट प्रतिभा कहां से आएगी और इससे भी अधिक मैं इस बात से चिंतित था कि हम अपना पहला रणजी ट्रॉफी खिताब कब जीतेंगे?

ऐसा नहीं है कि मध्य प्रदेश में प्रतिभा नहीं थी. उज्जैन के मेरे छोटे से गृहनगर ने नमन ओझा के रूप में भारत को एक टेस्ट क्रिकेटर दिया था. यह उस शहर के लिए कोई खास बुरा नहीं था, जहां लोग रोज मंदिरों में जाने की संस्कृति के साथ एक सीधी-साधी, गैर-प्रतिस्पर्धी जीवन जीते हैं.

मध्य प्रदेश के लोग स्वभाव से ही अत्यधिक महत्वाकांक्षी नहीं होते हैं. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अन्य राज्यों की तुलना में मध्य प्रदेश का औद्योगीकरण काफ़ी कम है. यह एक ऐसा राज्य है जहां लोग अभी भी मुख्य रूप से कृषि के प्राथमिक क्षेत्र में ही लगे हुए हैं.

इंदौर के एक प्रमुख क्रिकेट केंद्र होने के बावजूद इस शहर को 2016 में अपना पहला टेस्ट मैच आयोजित करने में 70 साल लग गए. लेकिन क्रिकेट के महान खिलाड़ियों की मौजूदगी बावजूद रणजी ट्रॉफी में जीत अभी भी मध्य प्रदेश के लिए एक छलावा बना हुआ था.

अंतिम सफलता

फिर मौजूदा घरेलू क्रिकेट सत्र में कुछ उल्लेखनीय सी बात हुई. रणजी ट्रॉफी फाइनल में हारने वाले कप्तान के रूप में पहचाने जाने वाले चंद्रकांत पंडित तेईस साल बाद मौजूदा सत्र के लिए मध्य प्रदेश की टीम कोच के रूप में वापस लौट आए थे. फाइनल में उनके टीम की भिड़ंत 41 बार की रणजी चैंपियन मुंबई से हुई. अमोल मजूमदार द्वारा प्रशिक्षित, मुंबई इस सीजन में एक दुर्जेय टीम जैसी थी.

मुंबई ने पहली पारी में 350 से अधिक का एक अच्छा सा स्कोर बनाया, लेकिन मध्य प्रदेश के ख्याल कुछ और ही थे और उसने अपनी पहली पारी में तीन शतकों के साथ इस स्कोर का जवाब दिया. 150 से अधिक रनों की इस महत्वपूर्ण बढ़त का मतलब था कि मुंबई को दूसरी पारी में अधिक रन बनाने का प्रयास करना पड़ा, ताकि वह मैच में बना रह सके और मध्य प्रदेश को पीछा करने के लिए कुछ खास लक्ष्य दे सके. मगर यह काफी नहीं था. तेईस साल पहले, मध्य प्रदेश एम चिन्नास्वामी स्टेडियम में हार गया था और कप्तान पंडित को चेहरे पर हाथ रखकर सिसकना पड़ा था. यह पंडित के लिए अंतिम प्रथम श्रेणी मैच भी साबित हुआ था.

26 जून 2022 को उसी मैदान पर जहां 23 साल पहले मध्य प्रदेश की टीम फाइनल हार गई थी, इसके तब के कप्तान और अब के कोच ने पहली बार ट्रॉफी अपने नाम की. यह हमारे जैसे मध्य प्रदेश क्रिकेट के प्रेमियों के लिए एक अद्भुत पल है.

विडंबना यह है कि मुझे बधाई का सबसे पहला फोन मुंबई के महान बल्लेबाज दिलीप वेंगसरकर की ओर से आया. मैंने उनके सामने स्वीकार किया कि हमारे लिए यह सोचना भी अकल्पनीय था कि मध्य प्रदेश उनके खेलने के दिनों में कभी मुंबई को हरा सकता था.

मध्य प्रदेश को अपने महान क्रिकेटरों का शुक्रिया अदा करना चाहिए

ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके प्रति आज के दिन में हम मध्य प्रदेश के क्रिकेट प्रेमियों को शुक्रिया अदा करना है. उनकी उल्लेखनीय प्रतिभा के दम पर ही मध्य प्रदेश क्रिकेट यहां तक पहुंच पाया है. शुरुआत कोट्टारी कनकैया (सीके) नायडू से करनी होगी जो निस्संदेह भारतीय क्रिकेट के एक प्रतिष्ठित सदस्य थे. फिर एस मुश्ताक अली और उनकी लगातार दो पीढ़ियों की प्रतिभा का नंबर आता है. चंदू सरवटे और हीरालाल गायकवाड़ की प्रतिभा भी उल्लेखनीय है. फिर भारत के पहले टेस्ट विकेटकीपर जेजी नावले, जिन्हें जैक हॉब्स ने जॉर्ज डकवर्थ के समकक्ष श्रेणी में दर्जा दिया था, भी हैं. इसके बाद बारी आती है बाएं हाथ के बल्लेबाज खांडेरो रंगनेकर की आक्रमणकारी प्रतिभा और देवेंद्र बुंदेला की बल्लेबाजी क्षमता की दीर्घजीविता की. मध्य प्रदेश क्रिकेट अशोक मांकड़ का भी बहुत शुक्रगुज़ार है, जिन्होंने युवाओं को बढ़ावा देने और युवा प्रतिभाओं को अवसर देने की संस्कृति लाई.

हमें इस अवसर पर एमएम और संजय जगदाले के पिता-पुत्र की जोड़ी के प्रशासनिक प्रयासों को भी याद करना चाहिए. हमारी गेंदबाजी इकाई, जिसने मुंबई को फाइनल में बल्लेबाजी के लिए एक अच्छे ट्रैक पर 350 के स्कोर तक सीमित कर दिया, वर्तमान कोच चंदू पंडित और निश्चित रूप से फाइनल के हमारे तीन शतकवीर- यश दुबे, शुभम शर्मा और रजत पाटीदार- भी बधाई के पात्र हैं.

मध्य प्रदेश क्रिकेट के लिए चीजें अब परिपक्व हो गई हैं. राज्य के कई क्रिकेटर जैसे की अवेश खान, जलज सक्सेना, वेंकटेश अय्यर और रजत पाटीदार अब सुर्खियों में हैं. यह उस समय से बहुत आगे की बात है जब मध्य प्रदेश में अमय खुरसिया के रूप में एकमात्र विश्व स्तरीय खिलाड़ी हुआ करता था, जिन्होंने बहुत ही बहादुरी से सचिन तेंदुलकर के साथ एकदिवसीय क्रिकेट में ओपनिंग स्लॉट (शुरुआती क्रम) के बल्लेबाज के रूप में भारतीय टीम में जगह बनाने हेतु प्रतिस्पर्धा की थी. अंततः मध्य प्रदेश अब रणजी ट्रॉफी चैंपियन है. खेल आपको सब कुछ देता है, लेकिन अपने नियत समय पर ही.

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