01/12/2022
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राहुल का चेहरा बदला, क्या यात्रा से राजनीति भी बदलेगी:दक्षिण नहीं, मध्य प्रदेश-राजस्थान में यात्रा ही अग्निपरीक्षा

कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा बुरहानपुर से मध्यप्रदेश में प्रवेश कर चुकी है। दक्षिण में मिले जन समर्थन के बाद अब हिंदी पट्टी में यात्रा को हिट कराने की चुनौती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूरी ताकत झोंक रहे हैं कि राहुल यहां के लोगों का दिल जीत लें। दरअसल, राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मध्यप्रदेश में राहुल की यात्रा के रिस्पॉन्स का बाकी हिंदी राज्यों पर भी असर पड़ेगा। इसी से राहुल का भविष्य तय होगा। राहुल की यात्रा को शुरू हुए आज 24 नवंबर को 78 दिन हो चुके हैं।

भारत जोड़ो यात्रा मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ वाले 6 जिलों की 17 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरेगी। राहुल बुरहानपुर, खंडवा, खरगोन, इंदौर, उज्जैन और आगर मालवा जिलों से गुजरेंगे। यात्रा के दौरान वे दो ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर और महाकालेश्वर के दर्शन करेंगे। यात्रा जब मालवा बेल्ट से होकर गुजरेगी, तो 26 नवंबर को आंबेडकर की जन्मस्थली पर राहुल एक बड़ी सभा को संबोधित करेंगे।

मालवा-निमाड़ में 66 विधानसभा सीटें, पिछली बार कांग्रेस ने 34 जीतीं
मालवा और निमाड़ में 66 विधानसभा सीटें हैं। भाजपा को 2018 में यहां से 29 सीटें मिली थीं। वहीं, कांग्रेस 34 सीटें जीतकर मध्यप्रदेश में 15 साल बाद सत्ता में आई थी। इससे पहले हुए 3 चुनावों में भाजपा सत्ता में बनी थी। अगले चुनाव में कांग्रेस की कोशिश 35 सीटें जीतने की है। ऐसे में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा कांग्रेस के लिए सत्ता का रास्ता बनाएगी? यात्रा 23 नवंबर से 4 दिसंबर शाम छह बजे तक मप्र में रहेगी फिर वह राजस्थान की ओर कूच करेगी।

321 लोकसभा सीटों पर समीकरण साधने की तैयारी

जिन 12 राज्यों से यात्रा निकाली जा रही है, उनके दायरे में 321 लोकसभा सीटें आती हैं। 2019 में कांग्रेस इनमें से केवल 37 सीटों पर जीत पाई थी। दक्षिण भारत के पांच राज्यों आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल और कर्नाटक से कुल मिलाकर लोकसभा की 129 सीटें आती हैं, जो लोकसभा की कुल 543 सीटों का करीब 24% हिस्सा है। पिछले लोकसभा चुनाव में BJP इन 129 सीटों में से सिर्फ 29 सीटें ही जीत सकी थी। कई राज्यों में तो उसका खाता भी नहीं खुला था। उत्तर भारत और अन्य क्षेत्रों के मुकाबले दक्षिण भारत में BJP की पैठ कमजोर है। राहुल इन सीटों पर ही जोर लगा रहे हैं, जो मिशन 2024 के लिए काफी अहम है।

लोकप्रियता ताे बढ़ी है, लेकिन मोदी से बहुत पीछे हैं राहुल

कांग्रेस की राजनीति को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि कांग्रेस को 2014 व 2019 के लोकसभा चुनाव में 19-20% वोट मिले हैं। यदि राहुल गांधी की लोकप्रियता देखें तो कई सर्वे हुए, जिसमें राहुल को 9 से 10% लोग ही पसंद कर रहे हैं। BJP को 31 से 38% वोट मिले, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पसंद करने वाले 50% से अधिक हैं। यदि भारत जोड़ो यात्रा के नजरिए से देखें तो राहुल को लेकर धारणा थी कि वे ज्यादातर समय विदेशों में बिताते हैं।

राहुल ने इस यात्रा से न सिर्फ अपनी विदेशी सैलानी वाली छवि को तोड़ा है, बल्कि एक गंभीर नेता के रूप में उभरे हैं। इस यात्रा का दक्षिण राज्यों में कितना प्रभाव हुआ है, इस सवाल पर किदवई कहते हैं कि राहुल को दक्षिण राज्यों में ज्यादा समर्थन मिला। तमिलनाडु की बात करें तो कांग्रेस यहां सहयोगी दल पर निर्भर है। यहां गठबंधन के सहारे ही कांग्रेस की गाड़ी चल रही है। केरल में 2021 के चुनाव में राहुल गांधी को अच्छा जनसमर्थन मिला था, लेकिन कांग्रेस को जीत नहीं मिली थी।

राजस्थान में बेबस, मप्र में मजबूत और UP- बिहार में कांग्रेस खस्ताहाल

यात्रा दक्षिण से निकलकर अब हिंदी भाषी राज्यों में प्रवेश कर चुकी है। इस पर किदवई कहते हैं कि देखिए, जब हम हिंदी पट्‌टी की बात करते हैं तो मूल रूप से 2 तरह के राज्य आते हैं। एक वे जहां अभी भी कांग्रेस की जमीन है, जैसे मध्यप्रदेश, जहां वह 2018 में सत्ता में आ चुकी है। मप्र में कांग्रेस बेहतर स्थिति में है। राज्य के जिन इलाकों से यात्रा गुजरेगी, वहां कांग्रेस सक्रिय है। यहां नेताओं ने श्रेय लेने के लिए उपयात्राएं भी निकाली गई हैं, इसका लाभ कांग्रेस को होगा। राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की जड़ें मजबूत हैं।

राजस्थान में जिस तरह से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व सचिन पायलट के बीच कलह चल रही है। उससे कांग्रेस का ग्रुप चेहरा भी नजर आ रहा है। इतना ही नहीं, जिन्हें पार्टी ने नोटिस दिया था, उन्हें यात्रा का समन्वयक बना दिया। इससे लगता है कि यहां कांग्रेस बेबस है। उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, हरियाणा,पंजाब और जम्मू-कश्मीर की बात करें तो यहां कांग्रेस बहुत ही कमजोर है। इन राज्यों में यात्रा का बहुत लाभ मिलेगा, ऐसी उम्मीद कम है।

चार-पांच राज्यों में राहुल की लोकप्रियता बढ़ी तो मोदी के लिए मुश्किल

किदवई का कहना है कि राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ा चैलेंज यह है कि कांग्रेस का ग्राफ कैसे बढ़े? कांग्रेस के समर्थन और उनके (राहुल गांधी) के समर्थक के बीच के गैप को पाट लेते हैं तो उनके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। देश में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सामने किसी नेता का प्रभाव सिंगल डिजिट में ही है, चाहे वह ममता बनर्जी हो या नीतीश कुमार। इसके बावजूद कांग्रेस ही इतना दमखम दिखा रही है। वो ही मोदी जैसे पहाड़ से पार पाने का दुस्साहस कर सकती है। उसका यह इतिहास भी रहा है। इस यात्रा से राहुल गांधी का ग्राफ राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ सकता है।

किदवई यह भी कहते हैं कि देश में अभी भी कुछ जगह राहुल गांधी का ग्राफ नरेंद्र मोदी से ज्यादा है, लेकिन वह राज्यवार है, जिसमें तामिलनाडु, केरल व पंजाब है। यदि इसमें चार-पांच राज्य और जुड़ जाते हैं तो यह राहुल के राजनीतिक भविष्य के लिए सुखद होगा। यात्रा के दौरान राहुल गांधी कांग्रेस का एजेंडा कम सिविल सोसाइटी के मुद्दे ज्यादा उठा रहे हैं, जिनका वोटों से सीधा तालमेल नजर नहीं आ रहा है।

आदिवासी वोटों को अपनी ओर करना है?

इस सवाल पर राजनीतिक विश्लेषक अरुण दीक्षित कहते हैं कि आप देखिए, पिछले विधानसभा चुनाव में आदिवासी सीटें कांग्रेस को ज्यादा और BJP को कम मिली थीं। आदिवासियों को लेकर बातें ज्यादा हो रही हैं। यह वर्ग अब जागरूक हो चुका है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आदिवासी नेतृत्व बिक जाता है या फिर लालच में आ जाता है। राहुल गांधी यात्रा के दौरान गरीब, किसान और निचले और उपेक्षित तबके की बात कर रहे हैं।

मुझे लगता है कि प्रदेश के नेता प्रदेश के मुद्दों को सही दिशा में उठाने व ले जाने की कोशिश करेंगे तो असर जरूर पड़ेगा, क्योंकि कांग्रेस का अध्यक्ष कोई भी हो, गांधी परिवार सर्वमान्य नेतृत्व करने वाला परिवार है। इस कारण BJP की कोशिश होगी कि मध्यप्रदेश में इस यात्रा को विवादित बनाए, लेकिन मौका तो कांग्रेस के लोग ही दे रहे हैं। यदि नेता एकजुट होकर कोशिश नहीं करेंगे तो यात्रा का बहुत असर नहीं पड़ेगा। ऐसे में सवाल है कि क्या राहुल गांधी की प्रदेश में 370 किमी की यात्रा से कांग्रेस की साल 2023 विधानसभा चुनाव में भाग्य पलटेगी?

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