08/02/2023
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3 लाख करोड़ रुपए में चीन को बर्बाद करने वाली घातक मिसाइलें खरीदेगा जापान: 90 साल बाद फिर चीन पर आक्रामक हुआ

1931 की बात है। जापान की एक रेलवे लाइन पर विस्फोट होता है। जापान इसमें चीन का हाथ बताता है। इसके जवाब में जापान, चीन के मंचूरिया में हमला कर देता है। जापान के सैनिकों का मुकाबला चीनी सैनिक नहीं कर सके।

नवंबर 1937 तक जापान, चीन के शंघाई पर भी कब्जा कर लेता है। जापानी सैनिकों का अगला टारगेट उस वक्त की चीन की राजधानी नानजिंग थी। दिसंबर 1937 में जापानी सैनिक नानजिंग पर कूच करते हैं। जापानी सैनिकों की आक्रामकता देख चीन के सैनिक भाग खड़े होते हैं।

नानजिंग नरसंहार के बाद एक बार फिर जापान के निशाने पर चीन है। जापान दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक बार फिर से चीन के खिलाफ हथियार जुटाने में लग गया है। जापान ने शुक्रवार को रक्षा बजट में GDP की तुलना में 2% का इजाफा किया है।

जापान 10 साल के अंदर काउंटर स्ट्राइक केपेबिलिटी हासिल करेगा

शांत देश का तमगा रखने वाले जापान ने इस हफ्ते नई नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटजी अपनाई है। इसके तहत दुश्मन के हमलों को रोकने के लिए काउंटर स्ट्राइक यानी जवाबी हमले की क्षमता को बढ़ाने की बात कही गई है।

चीन, नॉर्थ कोरिया और रूस से बढ़ते जोखिम से खुद को बचाने के लिए जापान अब आक्रामक नीति अपनाने के लिए रक्षा खर्च दोगुना करेगा। जापान की काउंटर स्ट्राइक केपेबिलिटी को सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है। जापान का लक्ष्य 10 सालों के अंदर देश के खिलाफ किसी भी हमले को बहुत पहले ही रोक देने की क्षमता हासिल करने पर है।

युद्ध नहीं करने की नीति खत्म होगी

काउंटर स्ट्राइक केपेबिलिटी जापान की 1956 की उस नीति को खत्म कर देगा, जिसके तहत दूसरे विश्व युद्ध में हारने के बाद जापान ने शांतिवादी संविधान अपनाया और बदले में अमेरिका ने जापान की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाई। जापान के संविधान के अनुच्छेद 9 के तहत वह कभी भी किसी देश के साथ अपने विवाद को सुलझाने के लिए सैन्य शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता।

जापान का कहना है कि देश पर मिसाइल हमले का बड़ा खतरा मंडरा रहा है और मौजूदा इंटरसेप्टर-मिसाइल डिफेंस सिस्टम इन्हें रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। देखा जाए तो नॉर्थ कोरिया ने इस साल अकेले 30 से ज्यादा बार मिसाइलें लॉन्च कीं, इनमें से एक मिसाइल जापान के ऊपर से गुजरी। चीन ने दक्षिणी जापानी द्वीपों के पास बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं।

जापान का कहना है कि जवाबी हमला करने की क्षमता हासिल करना संवैधानिक है। खासकर यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से जापान इस दिशा में काफी तेजी से काम कर रहा है। देखा जाए तो यूक्रेन को अमेरिका समेत जिन पश्चिमी देशों ने रूस के खिलाफ भड़काया, वे युद्ध होने पर साथ आने के बजाय दूर से ही मदद कर रहे हैं। ऐसे में जापान को भी लगता है कि ऐसी स्थिति होने पर जरूरी नहीं है कि अमेरिका उसकी मदद करेगा ही। इसलिए वह अपनी रक्षा नीति बदल रहा है।

यूक्रेन पर हमले ने दुनिया को सबक दिया है

डिफेंस एक्सपर्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर) जेएस सोढी कहते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद शिंजो आबे पहले नेता थे, जिन्होंने 2007 में कहा था कि जापान को अपनी सुरक्षा करने के लिए रक्षा बजट और सेना को मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा था कि चीन के मंसूबे अच्छे नहीं है।

साथ ही रूस पर यूक्रेन के हमले दुनियाभर के देशों को एक सबक दिया है। यानी यदि किसी देश पर हमला होता है, तो कोई भी देश ये सोचता है कि तीसरा देश हमारी मदद करने आएगा। यह तो वक्त ही बताएगा, अमूमन तौर पर कोई तीसरा देश मदद को नहीं आएगा। आपको अपनी रक्षा खुद करनी होगी। ऐसे में जिन देशों पर युद्ध का खतरा है, वो अपना रक्षा बजट और सैनिक शक्ति को बढ़ा रहे हैं।

रक्षा बजट में GDP की तुलना में 2% का इजाफा

जापान ने 5 सालों में रक्षा बजट में GDP की तुलना में 2% का इजाफा किया है। जापान का लक्ष्य 2027 तक रक्षा पर 320 अरब डॉलर यानी 26.4 लाख करोड़ रुपए खर्च करने का है। यह रक्षा बजट NATO यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन के मानक के हिसाब से हैं। जापान सरकार इन पैसों से चीन तक मार करने वाली घातक मिसाइल खरीदेगी।

जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा ने टेलीविजन पर एक संबोधन जारी करके नई रक्षा नीति का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि तेजी से अस्थिर सुरक्षा वातावरण के बीच जापान की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने के लिए सरकार ने तीन सुरक्षा दस्तावेजों को मंजूरी दी है। पहला- नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटजी, दूसरा- नेशनल डिफेंस स्ट्रैटजी और तीसरा- डिफेंस फोर्स डेवलपमेंट प्लान। जापान ने साफ कहा कि उसका फोकस चीन पर रहने वाला है।

अमेरिका से 500 टॉमहॉक मिसाइल खरीदेगा

जापान अगले पांच सालों में 37 अरब डॉलर यानी 3 लाख करोड़ रुपए लगाकर लंबी दूरी की मार करने वाली मिसाइलें खरीदेगा। इनमें अमेरिका से 500 टॉमहॉक मिसाइल खरीदने की बात शामिल है।

जापान की मित्सुबिशी हैवी इंडस्ट्री अपने टाइप-12 सरफेस-टु-शिप गाइडेड मिसाइल में सुधार करेगी और बड़े पैमाने पर इसे बनाएगी। इसके अलावा जापान नए हथियार भी बनाएगा। इनमें हाइपरसोनिक हथियार और मानव रहित एयरक्रॉफ्ट शामिल हैं।

चीन की विस्तारवादी नीति को रोकने के लिए जापान बदल रहा पॉलिसी

दरअसल, अमेरिकी कांग्रेस की स्पीकर नैंसी पेलोसी के ताइवान दौरे के बाद पिछले 4 अगस्त से चीन ने ताइवान को घेरकर सैन्य अभ्यास किया। इस दौरान चीन ने कई बार बैलिस्टिक मिसाइलें दागी। इनमें 5 मिसाइलें जापान के स्पेशल इकोनॉमिक जोन में भी गिरी हैं। चीन ने ये सभी मिसाइलें काफी सटीकता के साथ अपने लक्ष्य को भेदने में सक्षम हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि चीन ने जानबूझकर जापानी इलाके में अपनी मिसाइलों को दागा था।

जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा ने चीन के आक्रामक रवैये को जापान की क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बताया था। ताइवान को लेकर युद्ध की आशंका में जापान ने अपनी सैन्य क्षमता तेजी से बढ़ानी शुरू कर दी है। इसलिए बजट भी बढ़ाया जा रहा है।

यही नहीं, 17 नवंबर को दोनों शी जिनपिंग और किशीदा फुमियो की मुलाकात के कुछ ही दिन बाद सेनकाकू द्वीप समूह के पास जापान की समुद्री सीमा में चीन के कोस्टगार्ड के जहाज घुस गए थे।

जापान और चीन के बीच पुरानी दुश्मनी

जापान के उप प्रधानमंत्री के तौर पर तारो असो 2006 में भारत के दौरे पर आए थे। उस वक्त उन्होंने एक बयान में कहा था कि 1500 सालों से भी ज्यादा वक्त से इतिहास का ऐसा कोई वाकया नहीं है जब चीन के साथ हमारा संबंध ठीक रहा हो।

दोनों के बीच दुश्मनी का अंदाजा वहां रह रहे लोगों के मूड से भी लगाया जा सकता है। द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक 90% जापानी, चीन को अपने शत्रु के तौर पर देखते हैं। 60% चीनी भी जापान के बारे में ऐसी ही राय रखते हैं।

जैसा की ऊपर बता चुके हैं जापान और चीन ने आपस में युद्ध लड़ा है। इसकी शुरुआत 1930 में हुई और अंत 1945 में अमेरिका के परमाणु हमले के बाद हुआ। चीन और जापान के युद्ध में जापानी जुल्मों की दास्तान लंबी है। इनमें नानजिंग में रेप के साथ ही रासायनिक और जैविक हथियारों का इस्तेमाल भी शामिल है।

इसके अलावा मंचूरिया में इंसानों पर कई तरह के प्रयोग भी किए गए। जापान ने करीब 40 हजार चीनी मजदूरों को जापानी खदानों और फैक्ट्रियों में काम करने पर मजबूर किया। इनमें से ज्यादातर कुपोषण और दुर्व्यवहार के कारण मर गए।

सेनकाकू द्वीप विवाद

चीन और जापान के बीच कुछ द्वीपों को लेकर विवाद है। जापान में इन द्वीपों को सेनकाकू के नाम से जाना जाता है जबकि चीन के लोग इसे तियाओयू के नाम से जानते हैं। यह द्वीप समूह ताइवान के उत्तरपूर्व में है और इन पर कोई नहीं रहता। यहां के अनेक द्वीपों पर जापान के लोगों का निजी नियंत्रण रहा है।

कभी इन द्वीपों पर जापानी सीफूड की फैक्ट्रियां थीं और जापान इन्हें ऐतिहासिक रूप से और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक अपना बताता है। उधर चीन का कहना है कि जापान ने इन द्वीपों को 1895 में चीन से छीन लिया था और दूसरे विश्वयुद्ध के खत्म होने के बाद इन्हें चीन को लौटाया जाना चाहिए था।

विवादित द्वीप के आसपास सागर में मछलियों की घनी आबादी होने के साथ ही तेल के भंडार भी मौजूद हैं। जापान का आरोप है कि 1969 में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में सागर के नीचे तेल भंडार की खबर आने के बाद अचानक चीन ने इलाके पर अपना दावा ठोक दिया।

1972 में दोनों देशों के बीच जब रिश्तों को सामान्य बनाने की संधि हुई, तब भी इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं हुआ। 2012 में जापान ने सेनकाकू द्वीपों का राष्ट्रीयकरण करके इस मुद्दे को हवा दे दी। इसके बाद पूरे चीन में हिंसक प्रदर्शन हुए। चीन के तटरक्षक बल और मछली पकड़ने वाली नावों का इन इलाकों के चक्कर लगाने शुरू कर दिए और नियमित रूप से जापानी जल सीमा का उल्लंघन होने लगा।

 

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