08/02/2023
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जो जोशीमठ आज दरक रहा है: दशकों पहले विशेषज्ञ इसे लेकर दे चुके हैं चेतावनी

पिछले कुछ हफ्तों से, उत्तराखंड राज्य का एक मंदिरों वाला शहर अपने आप में समा रहा है. 28 दिसंबर और 8 जनवरी के बीच, यह समतल होने की ओर पूरे पांच सेंटीमीटर तक खिसक गया, जिससे सड़कें और इमारतों में दरारें पड़ने लगीं.

इस दौरान, जोशीमठ के असहाय निवासियों ने दरारें दिखाई देने के बाद अपने विस्थापन का विरोध किया है, जिसके सटीक कारण की जांच अभी भी जारी है. आसपास की इमारतों के लिए खतरा पैदा करने वाले भवनों को ध्वस्त कर दिया जाएगा और परिवारों का पुनर्वास किया जाएगा.

खबरों से पता चला है विशेषज्ञों की आधा दर्जन टीमें यह पता लगाने में जुटी हैं कि कस्बे में अचानक भू-धंसाव का कारण क्या है – एक ऐसी घटना जिसकी चेतावनी के संकेत दशकों से मौजूद थे.

जैसा कि धीरे-धीरे शहर धंस रहा है, इसके “विकास” की योजनाएं लटक गई हैं, क्योंकि एक संवेदनशील स्थान पर सतत विकास के बड़े प्रश्न का समाधान करने के लिए विकास के विचार पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है. मंदिरों के शहर की कहानी प्रकृति के धैर्य, अराजक विकास और परिणामी विस्थापन के चौराहे पर स्थित है. इसीलिए जोशीमठ दिप्रिंट का न्यूज़मेकर ऑफ द वीक है.

पहाड़ों के अंदर की ज़मीन क्यों हिल रही है

जोशीमठ में जो कुछ हो रहा है- भूधंसाव- आमतौर पर अंडरग्राऊंड कंस्ट्रक्शन की वजह से होता है और इन कारणों को प्राकृतिक और मानव जनित दोनों से जोड़ा जा सकता है.

जोशीमठ अति संवेदनशील भूकंपीय खतरे वाले V-ज़ोन में आता है, जिसका अर्थ है कि यह भूकंप के समय सबसे अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में है. शहर भी भूस्खलन के मलबे पर खड़ा किया गया था, न कि ठोस चट्टान पर, जिससे इसकी नींव कमज़ोर हो गई थी.

नौकरशाह एम.सी. मिश्रा ने 1976 में अपनी एक रिपोर्ट के जरिए इस इलाके में सड़कों के निर्माण के लिए चट्टानों की खुदाई और विस्फोट के साथ-साथ बेरोकटोक कंस्ट्रक्शन के खिलाफ चेतावनी दी थी. उन्होंने यह भी बताया था, “जोशीमठ में रेत और पत्थर का जमाव है- यह ठोस चट्टान नहीं है – इसलिए यह मकान बना कर बस्ती के लिए उपयुक्त स्थान नहीं था. विस्फोट, भारी यातायात के आवागमन से पैदा होने वाले कंपन से प्राकृतिक कारकों में असंतुलन पैदा होगा.”

लेकिन जोशीमठ में घरों, बहुमंजिला इमारतों और सड़कों का निर्माण बेरोकटोक जारी है, जिसकी आबादी 1872 में लगभग 400 से बढ़कर आज लगभग 25,000 हो गई है. चार धाम यात्रा के समय यह शहर लाखों तीर्थयात्रियों को ठहरने के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बन जाता है, जिससे इसके संसाधन कम हो जाते हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि कमज़ोर ओवरबर्डन पर अधिक दबाव डालने के कारण यहां जल निकासी और सीवरेज सिस्टम की कमी है, जिसके कारण मिट्टी में पानी का रिसाव हो सकता है.

2009 में, एनटीपीसी के हाइड्रो पावर प्लांट के लिए एक सुरंग खोदते समय, एक टनल बोरिंग मशीन फंस गई और चट्टान की पानी वाली परत, जिसे एक्विफाइर कहा जाता है,उसमें छेद हो गया, जिससे प्रति सेकंड 700 लीटर पानी का नुकसान हुआ.

2010 में जोशीमठ पर डिजास्टर लूम्स शीर्षक से एक पेपर में, भूवैज्ञानिकों ने कहा था कि पंक्चर जलभृत और पानी की कमी से शहर के ऊपर भूमि धंसने का खतरा है.

परियोजनाएं बनीं बाधा

दो बड़ी विकासात्मक परियोजनाएं जोशीमठ के करीब हैं. एक है एनटीपीसी थर्मल पावर प्रोजेक्ट, जो दशकों से विवादों में है. टीओआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, जोशीमठ संकट 2006 में इस प्रोजेक्ट के शुरू होने के बाद से पांचवीं बार सामने आया है.

स्थानीय निवासियों का मानना है कि प्रोजेक्ट की सुरंग – जिसमें अतीत में विस्फोट के लिए जिन तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है – उनकी दुर्दशा का कारण है. 2021 में, जब हिमस्खलन के कारण धौलीगंगा नदी में बाढ़ आई थी, तो सुरंग में पानी भर गया था. अटकलें लगाई गई कि जोशीमठ के नीचे पानी के कारण ज़मीन कमजोर हो गई, हालांकि, एक स्पष्ट कारण फिलहाल स्थापित किया जाना बाकी है.

दूसरा चार धाम सड़क चौड़ीकरण प्रोजेक्ट है, जिसमें मौजूदा सड़कों को 10 मीटर तक बढ़ाना शामिल है ताकि वे अधिक कारों को समायोजित कर सकें और तीर्थयात्रियों के लिए यातायात सुगम बन सकें. खुदाई, पेड़ों की कटाई, और मलबा डालने के अलावा, यातायात में वृद्धि भी आसपास के ग्लेशियरों को प्रभावित कर रही है, जिससे उनकी गिरावट में तेज़ी आ सकती है. प्रोजेक्ट्स के लिए एक बाइपास, हेलंग और मारवाड़ी के बीच, जोशीमठ को काटता है.

प्रोजेक्ट के लिए सुप्रीम कोर्ट की एक समिति के विशेषज्ञों ने बताया है कि इन क्षेत्रों में पहाड़ों की स्थिरता का पता लगाने के लिए पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है, जो भू-धंसाव के जोखिम को अधिक बढ़ा सकता है.  दोनों परियोजनाओं को जिला प्रशासन ने 5 जनवरी को रोक दिया था.

क्या चाहते हैं रहवासी

जोशीमठ के निवासी सरकार से वर्तमान में दिए गए मुआवजे की तुलना में अधिक मुआवजे की मांग कर रहे हैं. उनके सिर पर छत नहीं है, वे अंतरिम राहत में कम से कम पांच लाख रुपये चाहते हैं, जबकि सरकार ने 1.5 लाख – 1 लाख रुपये की पेशकश की है, जिसमें पुनर्वास का काम समायोजित किया जाएगा.

बहुत प्रतिरोध के बाद, निवासी अपने विरोध स्थल – दो होटलों को गिराने के लिए प्रशासन को सुरक्षित रूप से ध्वस्त करने की अनुमति दे रहे हैं ताकि आगे का इलाका तबाही से बचाया जा सके.

सुलोजना देवी जो कभी लौटेंगी नहीं कहती है- “मौत अपरिहार्य है, है ना ? अपने घरों, अपने जीवन को पीछे छोड़ने का क्या मतलब है, अगर यह किसी उचित चीज़ के लिए नहीं है? फिर, यहां मरना बेहतर है.”

 

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