08/02/2023
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क्या इस्तीफों पर स्पीकर ने नियमों का पालन नहीं किया: 91 विधायकों ने नहीं किया था रिजाइन

जोशी के पास थे 2 उपाय..

विधायकों के इस्तीफे पर फैसला लेने की कोई तय समय-सीमा तो होनी चाहिए। इतने लंबे समय तक इस्तीफों को पेंडिंग नहीं रखना चाहिए, ऐसा करना हॉर्स ट्रेडिंग (विधायकों की खरीद-फरोख्त) को बढ़ावा देना है। राजस्थान के विधानसभा अध्यक्ष यह भी बताएं कि क्या वह इस फैसले को अनिश्चितकाल के लिए पेंडिंग रख सकते हैं? 25 सितंबर को हुए विधायकों के इस्तीफे के केस में यह अवधि कितनी होनी चाहिए?

इस मामले में स्पीकर के इस्तीफों पर की गई टिप्पणियां और दस्तावेजों को भी पेश किया जाए। MLA कभी इस्तीफा दे रहे हैं, कभी वापस ले रहे हैं। वे खुद तय नहीं कर पा रहे हैं कि जनप्रतिनिधि रहेंगे या नहीं, ऐसे में वे जनप्रतिनिधि के रूप में कैसे काम करेंगे?

25 सितंबर को हुए सियासी बवाल के बाद विधायकों के इस्तीफे पर राजस्थान हाईकोर्ट की ये टिप्पणी क्या विधानसभा अध्यक्षों के फैसले लेने के अधिकार पर कोई नई लकीर खींचने का संकेत है? आखिर कितने विधायकों ने इस्तीफा सौंपा था? क्या विधानसभा अध्यक्ष 110 दिन तक 80 से ज्यादा विधायकों के इस्तीफे पर फैसला पेंडिंग रख सकते हैं? आखिर इसे लेकर एक स्टैंडर्ड प्रोसेस क्या है और क्या स्पीकर ने इसका पालन किया?

विधानसभा ने कहा- 91 नहीं 81 विधायकों ने इस्तीफा दिया था
25 सितंबर को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थकों ने दावा किया था कि 90 से ज्यादा विधायकों का इस्तीफा डॉ. सीपी जोशी को सौंपा गया है। भाजपा ने भी इतनी ही संख्या बताई थी, लेकिन विधानसभा सचिव महावीर प्रसाद शर्मा ने इस दावे को नकार दिया है।

इस मामले में दायर की गई याचिका काे लेकर हाईकोर्ट को जवाब दिया है कि सिर्फ 81 विधायकों के इस्तीफे विधानसभा अध्यक्ष को दिए गए थे। ये इस्तीफे 6 विधायकों ने सौंपे थे। इसमें 5 इस्तीफे फोटो कॉपी के रूप में थे। ये सभी इस्तीफे विधायकों ने स्पीकर के सामने उपस्थित होकर वापस ले लिए हैं।

विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफा सौंपते हुए जो फोटो मीडिया में आया था, उसमें संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल, मुख्य सचेतक महेश जोशी, उप मुख्य सचेतक महेंद्र चौधरी, मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास, सीएम सलाहकार संयम लोढ़ा और विधायक रफीक खान दिख रहे हैं।

ऐसी स्थिति में 2 विकल्प होते हैं
विधानसभा चलाने के लिए बाकायदा नियम बने हुए हैं। हर फैसला इसी नियम के तहत होता है। इस्तीफे का भी। इसे राजस्थान विधानसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन संबंधी नियम नाम दिया गया है। इसका नियम

173(2) कहता है कि अगर कोई विधायक अपना इस्तीफा खुद स्पीकर को सौंपता है व बताता है कि उसका इस्तीफा वास्तविक है और स्पीकर की इसे लेकर कोई शंका नहीं है तो वे इस्तीफा तुरंत प्रभाव से स्वीकार कर सकते हैं।

173(3) कहता है कि स्पीकर अगर इस्तीफे पोस्ट या किसी और व्यक्ति के माध्यम से इस्तीफे हासिल करते हैं तो इसकी वास्तविकता की जांच के लिए स्पीकर जांच करा सकते हैं। इसके लिए स्पीकर खुद जांच कर सकते हैं कि या किसी एजेंसी के मार्फत जांच करा सकते हैं। ऐसी स्थिति में अगर स्पीकर को लगता है कि इस्तीफा वास्तविक नहीं है तो वह अस्वीकार भी कर सकते हैं।

173(4) कोई भी विधायक अपना इस्तीफा वापस ले सकता है जब तक स्पीकर ने उसे स्वीकार ना किया हो।

इस नियम में यह तो बताया गया है कि इस्तीफे को लेकर प्रोसेस क्या होगी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अध्यक्ष को इस्तीफे पर कितने समय में फैसला लेना होगा। यहीं से शुरू होता है विधानसभा अध्यक्ष का स्वविवेक और परिस्थितियों के हिसाब से इन नियमों की व्याख्या करके फैसले लेने का अधिकार।

तो क्या विधानसभा अध्यक्ष ने नियम का पालन किया?
विधानसभा सचिव महावीर प्रसाद शर्मा ने हाईकोर्ट को दिए जवाब में कहा है कि 6 विधायकों ने स्पीकर से मिलकर सभी विधायकों के इस्तीफे सौंपे थे। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष शांतिलाल चपलोत के मुताबिक इस्तीफे स्वीकार करना या न करना विधानसभा अध्यक्ष का विशेषाधिकार है। ऐसी स्थिति में स्पीकर को इस्तीफों की जांच करना चाहिए। जांच करने की प्रोसेस यह होती है कि स्पीकर विधानसभा सचिव को इस्तीफे मार्क करके भेजता है और एक-एक विधायक को बुलाकर पूछता है।

भास्कर की पड़ताल में सामने आया है कि यह जांच नहीं की गई। हालांकि इस्तीफे विधानसभा सचिव को जरूर मार्क किए गए। संसदीय मामलों के जानकार भगवान इसरानी के मुताबिक जब विधायक खुद उपस्थित होकर इस्तीफा न दे तो स्पीकर नोटिस देकर उन्हें इस बारे में पूछने के लिए बुलाते हैं, यदि नोटिस दिया होगा तो रिकॉर्ड में आ जाएगा।

हाईकोर्ट ने 30 जनवरी तक इस्तीफों पर स्पीकर की टिप्पणी और दस्तावेज भी पेश करने के निर्देश दिए हैं, दस्तावेज पेश करने पर यह भी पता चल जाएगा कि यह नोटिस किस रूप में और कब दिए गए।

गैर-जरूरी समय लगे तो कोर्ट को अधिकार
मप्र विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव और संसदीय मामलों के जानकार भगवान देव इसरानी के मुताबिक इस्तीफे पर फैसला लेने में अनावश्यक रूप से देरी हो तो कोर्ट को पूछने का पूरा अधिकार है और फैसले लेने के लिए निर्देश देने का भी। विधानसभा अध्यक्ष भी कानून और नियमों से बंधे होते हैं। पूरे देश में यही परंपरा है कि यदि कोई विधायक इस्तीफा देते हैं तो उस पर यथाशीघ्र फैसला लिया जाता है।

याचिका लगाने वाले राठौड़ पर दबाव बनाना शुरू
इधर, विधानसभा सत्र शुरू होने से ठीक पहले अब दबाव की राजनीति शुरू हो गई है। इस्तीफों को लेकर हाईकोर्ट में याचिका लगाने वाले राजेंद्र राठौड़ के खिलाफ निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव दिया है।

इसे दबाव की राजनीति के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इसे लेकर राजेंद्र राठौड़ ने स्पष्ट कह दिया है कि ऐसा कोई प्रस्ताव बनता नहीं है। राठौड़ ने कहा कि हाईकोर्ट में मेरी याचिका पर CM के सलाहकार को डेढ़ महीने बाद विशेषाधिकार याद आया है। विधानसभा के नियम और प्रक्रियाओं में यह स्पष्ट उल्लेख है कि जो मामले न्यायालय के विचाराधीन होते हैं उन पर सदन में चर्चा नहीं होती है।

राठौड़ ने कहा कि अगर CM के सलाहकार विधानसभा के नियम पढ़ लेते तो शायद ये प्रस्ताव लेकर नहीं आते। मैं इस विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव का सामना करूंगा।

फोटो कॉपी वाले विधायक कौन?
हाईकोर्ट को भेजे गए अपने जवाब में विधानसभा सचिव ने कहा है कि 81 में से 5 विधायकों के इस्तीफे की फोटो कॉपी सौंपी गई थी। सियासी हलकों में चर्चा इस बात की है कि ये 5 विधायक कौन थे? ये विधायक गहलोत खेमे के थे या किसी अन्य खेमे के, इसे लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं।

कोर्ट के फैसले पर टिकी सबकी नजर
विधायकों के इस्तीफे का ये मामला सदन और हाईकोर्ट के बीच टकराव तक तो नहीं पहुंचा, लेकिन कोर्ट के फैसले पर कई चीजें निर्भर करेंगी। इस पर सबकी नजर टिकी है। इससे पहले भी कई बार विधानसभा और हाईकोर्ट के बीच टकराव की स्थिति बनी है।

पूर्व स्पीकर सुमित्रा सिंह का तर्क है कि इस्तीफों पर स्पीकर को फैसला लेना होता है, इसमें विधानसभा स्पीकर चाहते तो नोटिस ही नहीं लेते, लेकिन इस हालत में टकराव हो जाता। अब मौजूदा हालत में स्पीकर ने टकराव टालना उचित समझा होगा।

विधानसभा के मामलों के जानकार और विधानसभा के पूर्व ऐडिटर डिबेट सुरेश कुमार जैन का कहना है कि विधानसभा और अदालतों के बीच टकराव के लिए दोनों ही पक्ष जिम्मेदार हैं। अब विधायकों के इस्तीफों को ही लीजिए, कई बार महीनों तक इस्तीफे स्वीकार नहीं होते और कई बार विधायक के इस्तीफे तत्काल मंजूर हो जाते हैं। अदालतों को दखल देने का स्पेस फैसलों में भेदभाव करने से मिलता है। दलबदल के मामले में भी ऐसा ही होता है।

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